जिला - बलौदाबाजार ( छ. ग.)
विषय - मुक्त
विधा - छंद मुक्त कविता
शीर्षक - आध्यात्मिक पहेली
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// आध्यात्मिक पहेली //
अंधे माता - पिता को वह ,
लेकर अपने कंधे ।
तीर्थ घुमाने को निकला ,
छोड़ के सारे धंधे ।।
धोखे से वन में एक राजा ,
मारे उनको बाण ।
बिना पुत्र माता - पिता भी ,
तजे शोक में प्राण ।।
सम्राट पिता की गोद मे ,
लगा बैठने बालक जब ।
डाँट पड़ी सौतेली माँ की ,
छोड़ा घर-परिवार सब ।।
नारदजी से दीक्षा लेकर ,
जंगल मे तप किया प्रबल ।
प्रकट किया ईश्वर को जिसने ,
पाया दुर्लभ पद अटल ।।
बचपन से ही प्रभु भक्ति में ,
जो रहते तल्लीन सदा ।
दण्ड और भय से समझाते ,
देव विरोधी असुर पिता ।।
लेकर गोद आग पर बैठी ,
भस्म हुई वह स्वयं बुआ ।
उसे बचाने नरसिंह भगवन ,
खंभ फाड़कर प्रकट हुआ ।।
छोटा कुल और छोटी जाति ,
वनवासिनी निरक्षर ।
'आयेंगे प्रभु द्वार तुम्हारी '-
कह गये मतंग ऋषिवर ।।
चखकर जूठे बेर खिलाई ,
जब आये श्रीराम ।
भक्तों की गणना में उनका ,
आता है शुभ नाम ।।
शिष्या वह रैदास की ,
थी महलों की रानी ।
कृष्ण भक्ति में होकर लीन ,
पद गाती मृदु बानी ।।
घरवालों ने खूब सताया ,
क्यों बनती है जोगन ?
लोक लाज तज प्रेम दीवानी ,
पायी राम रतन धन ।।
काशी में एक दंपत्ति ने ,
पाया शिशु अनाथ ।
कपड़ा बुन वह करे गुजारा ,
भजन भाव के साथ ।।
रामानन्द से दीक्षा लेकर ,
निर्गुण पंथ चलाया ।
' गोविंद से भी गुरु बड़े हैं '-
यह सबको बतलाया ।।
माता - पिता से वंचित बालक ,
लोग कहे रामबोला ।
पत्नी ने जब ताना मारी ,
ज्ञान की गठरी खोला ।।
रामचरित गायन करते थे ,
हो गये संत कविवर ।
सगुण भक्तिमय उनके ग्रन्थ ,
आज मिलेंगे घर - घर ।।
परमहंस श्री रामकृष्ण का ,
शिष्य बड़ा विद्वान ।
गया शिकागो धर्म सभा मे ,
दिया दिव्य व्याख्यान ।।
कोटि जनों के प्रेरणास्रोत ,
हिन्दू संत ब्रम्हचारी ।
मिशन बनाकर सेवा की थी ,
मानवता की भारी ।।
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