सुंदरगढ़, ओड़िसा
विधा -कविता
शीर्षक-हालात
कल तक जो रूबरू होते थे
आज कहाँ गुमनाम हो गए
जाने कब थमेगी ये सिलसिला
मौतों की ,जो आज आम हो गए
अब इस रात की कोई सहर नही
अब शहर में लाशो के ढेर हो गए
चाँद रूठा है लगता है कायनात से
रोशनी भी मानो अब खफा हो गए
अब हर मंजर पे ख़ौफ़ का साया है
ना जाने अब किस पर मंडराया है
विलाप,वेदना,वियोग का अंत कहाँ है?
ये मौत से आंख मिचौली खेलती जहां है।
महामारी की मार से बिखरा हर आशियाँ है
जल रहीं हैं दरों दीवार और बस्तियां
मातम का शोर ही फैला चारों ओर है
जैसे उजाड़- बियाबान में घिरा इंसान है।
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