द्रोपदी साहू "सरसिज"
महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक:"कातिक नहई"(छत्तीसगढ़ी)
विधा-कविता(तुकांत)
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आँखी ल रमजत तरिया के जवई।
जाड़ म मुँधरहा ले कातिक नहई।।
पहिली दिन के गजब जोरा
झपोली म फूल बाती पतेरा
जम्मों संगी मन के अगोरा
गली म गोठियावत दरदर दरदर रेंगई।
जाड़ म मुँधरहा ले…...............
घपटे कुलुप अंधियार मा
जम्मों धरे ओनहा पार मा
दतवन ल खोंचे दनगार मा
नहा के कुरता अँगरखा उल्टा पहिरई।|
जाड़ म मुंधरहा ले….....................
सब देंवता के पूजा करँय
झुल झुल आरती उतारँय
अउ जय जय गोहार पारँय
फेर खेलय खो खो कबड्डी ,भुर्री तपई।
जाड़ म मुँधरहा ले…......................
संग मा खेलँय टुरा टुरी मन
पाप नई राहय काकरो तन
मइलाय नहीं काकरो मन
आज नाननान बेटी मन के होगे भीतरई।
जाड़ म मुँधरहा ले….....…...............
कातिक नहई मा पाथे पुन्न
देंहे घलो पोठ बनथे जी दुन्न
मन मा उच्छाह रथे येला गुन्न
सुकुवा उवय कुकरा बासे चिरई के नरियई।
जाड़ मा मुँधरहा ले…..........................
आँखी ला रमजत तरिया के जवई।
जाड़ मा मुँधरहा ले कातिक नहई।।
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