Monday, November 2, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार की रचना- भ्रूण बेटी की कल्पना

रचनाकार- उर्मिला सिदार 
 ग्राम -बुला़ँकी
 जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ)   
विधा -कविता  (मुक्तक छंद)
शीर्षक -"भ्रूण बेटी की कल्पना"
दिनांक - 02/11/2020
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*भ्रूण बेटी की कल्पना*

मांँ मैं तुझे पुकार रही हूंँ,
अंतर्रात्मा से गुहार रही हूंँ,
मैं आना चाहती हूंँ माँ,
माँं मुझे आने दो। 

मैं भी प्रकृति की,
एक इकाई आत्मा हूंँ।
मैं भी धरा पर स्वेच्छा से,
आना चाहती हूँ मांँ।
मांँ मैं तुझे पुकार रही हूंँ,
मैं नन्हीं जीवन पुकार रही हूँ।
तेरी सुनी गोद आबाद करूँगी,
मेरे किलकारी से आंगन गुँजेगी।
रुनझुन पायल की सबद गली सुनेंगी,
मैं आपकी ही बेटी नहीं मांँ,
मैं समाज की भी बेटी बनूंँगी।
मैं मातृभूमि की ही नहीं,
धरा की भी लाडली बनूंँगी।
धरा में सुसभ्य समाज गढ़ुँगी,
मानवता की पुजारिन बनकर, 
तेरी सुनी घर आबाद कऱूँगी।

मांँ मैं तुझे पुकार रही हूँ,
अंतर्रात्मा से गुहार रही हूंँ।
मैं आना चाहती हूँ मांँ,
मांँ मुझे आने दो।

ऋतंभरा, मदर टेरेसा बनकर,
समाज की सच्ची साध्वी बनूंँगी।
आंँखों में तेरे आंँसू ना बहे,
ऐसे प्यार मैं तुझसे करूंँगी।
ऐसा काम मैं कभी ना करूँंगी, 
जिससे तेरा सर झुक जाए।
मान हो तेरा, सम्मान हो,
मेरे कर्म से तुझे अभिमान हो।
बेटी होने का पश्चाताप ना हो,
ऐसे कार्य कर दिखाऊंगी मांँ।

मांँ मैं तुझे पुकार रही हूंँ,
अंतर्रात्मा से गुहार रहीं हूंँ।
मैं आना चाहती हूंँ मांँ,
मांँ मुझे आने दो।

मैं भी जीवन तू ही जीवन,
यह समुदाय समाज भी जीवन,
जैसा मैं चाहती हूँ माँ ।
वैसा तुम भी चाहती हो,
धरा का हर जीवन भी,
सुख  होना चाहता है।
फिर भी मांँ तुम मुझे,
क्यों नहीं समझती हो,
तू नहीं समझेगी मांँ,
तो और कौन मुझे समझेगा। 
तेरे सिवाय और कौन खड़ा है,
धरती पर मेरे स्वागत के लिए।
मांँ मैं तेरे पास आना चाहती हूंँ
तेरे आँंसू पोंछने के लिए।

मांँ मैं तुझे पुकार रही हूंँ,
अंतर्रात्मा से गुहार रही हूंँ।
मां मैं आना चाहती हूंँ,
मां मुझे आने दो।

मैं तूफान की तरह आना,
चाहती हूंँ ,समाज के लिए। 
जो बेटियाें को जन्म से पहले, 
रौंदने वाले मजबूर करने वाले,
निर्दयी शैतान के लिए। 
तुम स्वतंत्र हो शांत मन से,
पुनः चिंतन सुविचार कर माँ।
मन में कोई भ्रम ना रहे,
ऐसे तू कामना कर माँ ।
धर्म की रक्षा के लिए,
सत्य की राह पर चल।
स्वयं से स्वयं पर न्याय कर,
मांँ समझ पा रही है मुझे तो,
सहर्ष स्वीकार कर।
एक बार मांँ तुम, मुझ पर,
दया कर माँं,दया कर मांँ।

मैं तुझे पुकार रही हूँ,
अंतर्रात्मा से गुहार रही हूंँ।
मांँ मैं आना चाहती हूंँ,
मां मुझे आने दो।
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                          उर्मिल सिदार

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