सुंदरगढ़,ओडिशा
विधा-कविता
शीर्षक-झील
बड़ी शांत सी झील
फूल टपका जल में
जल उठा झील का पानी
हलचल हुई और अशांत हुई झील
पर अपने में ही सकुचाई, सिमटी रही
सागर की तरह शोर मचाना
उफान मार बहना ना आया उसे
अपने मे ही अपना अस्तित्व तलाशती रही
पर कुछ तो असर हुआ था
झील के गहरे हृदय तल में
पतवार की प्रतीक्षा में वह स्थिर रही
कि कोई फिर से हृदय चीर दे
तब बताएगी हाले-ए-दिल अपना
इसलिए अनवरत आंसू बहाते
वह खामोश रही...............
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