स्थान---नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला -जांजगीर-चांपा/छत्तीसगढ़
विधा-कविता मुक्त
विषय-लहरें
शीर्षक-लहरें खुद को बना डालो
देखो लहरों को उठते हुए ,वैसी मन बसा डालो।
किसे बनाती किसे मिटाती,वैसी कर्म बना डालो ।
जब सागर से उठती है, मोती बाहर आते है ।
जिस मानव को मिलता,उसका ही गुण गाते हैं ।
समाज है सब कुछ अपना,ऐसा धर्म चला डालो ।
लहरों में जब होती प्रदूषण, सागर पी जाती है ।
शुद्ध जल मिलता लोगों को, जीवन बचाती है ।
अपना जीवन डूबे तो डूबे ,दुसरों का बचा डालो ।
लहरें तट पर आती है,तट को बदल जाती है ।
बदल जाती वहां का जीवन, जो सबको भाती है ।
लहलहा उठती हैं फसल,ऐसा ढंग खुद में बसा डालो ।
लहरों की सिर्फ आवाजें मत सुनो,उनकी दिशाएं मत देखो ।
किस्से कहानियों में कुछ नहीं, बस वर्तमान को सोचो ।
लहरों की तरह चलना सीखो,जो राह रोके मिटा डालो ।
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