सुंदरगढ़, ओड़िसा
विधा-कविता
विषय-लहरें/प्रवाह
शीर्षक-लहरें कुछ कहती हैं
उठती-गिरती लहरों सा जीवन है यारों
ना थकना,ना रुकना लहरों से सीखो
खुद में खुद को समेटे हुए
अपनी परिधि में सिमटे हुए
सागर के उर की धड़कन सी
मानों अपने प्रवाह से उत्साह
का जीवन में संचार कर रहें
इनकी गर्जन रण-भेरी सा
मानों युद्ध का उदघोष कर रही
आकाश को छूने की आकांक्षा
मन मे ज्यों उमंग भर रही
दिन-रात का फर्क मिटा कर
निरन्तर सदियों से जो चल रही
लहरें कुछ तो कहती हैं
बार-बार उठकर संदेश कोई देती हैं
अपने कम्पन,थिरकन,मधुमयगान से
जीवन को खुशियों के संगीत सुनाती हैं
लेती नही किसी का कुछ भी
हर बार कुछ दे के ही जाती हैं।
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