स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- लहर
पल-पल मन में लहरें उठती,
जानें कितनी सवाल उफनती
कभी हँसाती, कभी रुलाती,
कण-कण चट्टान तोड़ती भी
परत-परत माटी बनाती भी
कभी नैया डगमगाती,कभी
सूखे तट की प्यास बुझाती ।
शीत बन जब यह आती,
कितनों पर कहर ढाती,
जल की बूंदे रुकी-रुकी,
साँसे कितनों की थमी-थमी
हड्डियों तक लहर की ठिठुरन
कोहरे से थमता जीवन,
पड़े फसलों पर ओले की मार
पीड़ा से तड़प उठें किसान
देखी लहर-लहर में भिन्नता
मन का सागर भी शीत हुआ ।।
No comments:
Post a Comment