जिला :- महासमुंद
विषय:- धनतेरस
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- धनतेरस व यम आराधना
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देव कृपा से है मिला, राजन को संतान।
जप - तप कर उनको मिली, अनुपम यह वरदान।।१।।
देख कुण्डली ऋषि कहें, होगी मृत्यु अकाल।
विवाह बंधन ही बने, कुल कुंवर के काल।।२।।
कुल कुंवर के काल से, दूरी की थी आस।
पर गंधर्व विवाह से, असफल हुए प्रयास।।३।।
चार दिवस के बाद ही, आया जी यमदूत।
जान बचाने को अड़ी, नव भार्या मजबूत।।४।।
दीप जलाकर द्वार में, कहा करो प्रभु त्राण।
हे प्रभु मेरे नाथ को, दे दो वर में प्राण।।५।।
त्रयोदशी की रात को, जले द्वार में दीप।
प्रभुवर यम आशीष दे, हैं वे देव प्रदीप।।६।।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने धनतेरस के मिथक को छंदबद्ध करने का प्रयास करते हुए कहा है कि धनतेरस के दिन राजा हेम की पुत्रवधू ने अपने पति की रक्षा द्वार पर दीप जलाकर किया था। और इसी आज भी यमदेव की आराधना में धनतेरस के दिन द्वार पर दीप जलाए जाते हैं।
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