स्थान- कचंदा
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा- कविता
विषय- आदमी
शीर्षक- तीन आदमी
तीन आदमी
इस दुनिया में आते ही फंस गया माया जाल में।
उन्नति अपनी कर न सका, रह गया उसी हाल में।
रह गया उसी हाल, हुई नहीं उसकी प्रगति।
जीवन उसका बेकार हुआ और हुई दुर्गति।
कह "प्रधान" कविराय, बदला नहीं नेक चाल में।
जीते जी तड़पता रहा, मर गया कुछ ही साल में।
इस दुनिया में आया था बनने को इंसान।
इंसान वह बन न पाया, बन गया हैवान।
बन गया हैवान, जिंदगी उससे खफ़ा हो गई।
गया मोत के पास लेकिन वह उससे दफा हो गई।
कह "प्रधान" कविराय,जिंदगी से हो गई निराशा।
करने कुछ कर दिखाने की छुट गई सब आशा।
आया था इस दुनिया अमर होने के वास्ते।
लग गई बीमारी और मर गया खाँस्ते-खाँस्ते।
मर गया खाँस्ते-खाँस्ते, मकसद हुआ अधुरा।
सोचा था अमर होकर देगा सबको सहारा।
कह "प्रधान" कविराय, सब सोच हुआ बेकार।
अपनी इच्छा, मकसद को कर न पाया साकार।
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