ग्राम -बुलाँकी
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
विधा -आलेख
विषय -बाल साहित्य एक परिचय
दिनांक- 21/11 /2020
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*आलेख*
बाल साहित्य बच्चों को सरल शैली से रुचिकर बनाकर भावों को बोध कराने की विभिन्न शैली है। इन्हीं रूची मूलक शैली से बच्चों को विभिन्न प्रकार के भावों को बच्चों में अंतरित किया जाता है। जिससे बच्चा भावों को समझ कर उसे प्रमाणित कर सकने के लिए दृढ़ संकल्प ले लेता है। ऐसे ही भावनाओं की व्याख्यान को बाल साहित्य कहा जाता है। बाल साहित्य ,साहित्यकारों द्वारा अनेक विधाओ में बच्चों को संप्रेषित कर भावों को पहुंचाया जा सकता है। बच्चे अपने पूर्वज से ही संस्कार सीखता है ,क्योंकि माता-पिता दोनों के अस्तित्व से ही बच्चों की मानसिकता का विकास होता है । माता ममता के अर्थ में संबंधी को पोषण के अर्थ में स्वीकारता है और पिता को वात्सल्य भाव से स्वीकार होता है। बच्चे अपने दादा -दादी ,नाना- नानी से कथा कहानी कविता और बहुत सारे बाल साहित्य विधाओं से भावों में जीना या संस्कार सीखाता है। बच्चे आगे पीढ़ी के कर्णधार होते हैं ।अतः बच्चों को बचपन से जैसे संस्कार दिया जाता है वैसे ही संस्कार पाकर घर -परिवार, समाज में सम्मान और श्रेष्ठता के साथ जीता हुआ समाज में दिखाई पड़ता है ।बाल साहित्य अनेक विधाओं में कम समय में पढ़ा जा सके ,ज्यादा लंबा होने से बच्चे उब जाते हैं ,अतः उनकी रूचि को ध्यान में रखते हुए छोटी-छोटी लघु कथाओं छोटी ,कविताएं ,चुटकुला और बहुत सारे विधाएं हैं ,जो बच्चों के लिए रुचिकर हो , बच्चों के साहित्य चित्रात्मक होने से बच्चों को पढ़ने में मन लगता है ।बाल साहित्य ज्ञानवर्धक होना चाहिए ताकि उनकी ज्ञान के प्रति मानसिकता बना रहे बाल साहित्य बच्चों को अपने शैली में लिखने और भावों को व्यक्त कर सकने के लिए बाल साहित्य की रचना की जाती है ,ताकि बच्चों में बौद्धिक विकास हो सके ।इन्हीं बौद्धिक विकास के लिए साहित्य रचना आवश्यक होता है। बच्चे बौद्धिक विकास कर अपने जीवन को सार्थक बनाकर समाज में गौरवान्वित होकर जी पाने की दक्षता हासिल कर सकता है।
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उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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