जिला - बलौदाबाजार ( छ.ग. )
विषय - बाल साहित्य : एक परिचय
विधा - आलेख
शीर्षक - बाल साहित्य
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// बाल साहित्य //
साहित्य की ऐसी विधा जो बच्चों के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री प्रस्तुत करती है , उसे बाल साहित्य कहा जाता है । सहित्य की यह प्राचीन परम्परा है । लोक संस्कृति में दादी , नानी आदि के द्वारा बालकों के लिए मनोरंजक व ज्ञानवर्धक कहानी , चुटकुला , कविता ,गीत , पहेली इत्यादि कहना - सुनना प्रचलित है । इन सबका उद्देश्य बच्चों में व्यवहारिक ज्ञान व संस्कार सिंचन करना है । इससे बच्चों को देश , धर्म , संस्कृति , आचार - विचार आदि का हँसते - खेलते सहज में जानकारी हो जाती है ।
पंचतंत्र , हितोपदेश , पौराणिक कथानक , महापुरुषों के प्रेरक प्रसंग , काल्पनिक परी कथाएँ , राजा - रानी की कहानियाँ आदि बच्चों को विशेष प्रिय होता है । हिन्दी भाषा में देवपुत्र , चंदामामा एवं गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित अनेक बाल पुस्तिका व पत्र - पत्रिकाएँ निकलती है । समाचार पत्र में भी बच्चों का अलग कोना रहता है । और भी विभिन्न प्रकाशनों मे प्रायः बाल रचनाएँ होती ही हैं । कुल मिलाकर बाल साहित्य प्रचुर मात्रा में है , कोई कमी नहीं है । बच्चों को चाहिए कि वे इनका लाभ अवश्य लें ।
किन्तु आज के आधुनिक परिवेश में जिस तरह बच्चे साहित्य के पठन - पाठन से दूर होते जा रहे हैं , यह चिंता का विषय है । मोबाइल , इंटरनेट , क्रिकेट , सिनेमा , वीडियो गेम आदि अच्छे तो हैं मगर इसी में दिन - रात अनावश्यक रूप से डूबा हुआ बच्चा साहित्य और संस्कृति को समझेगा व जीवन मे अपनाएगा , ऐसी अपेक्षा करना कोई समझदारी नहीं है । विज्ञान का सदुपयोग कम अपितु दुरुपयोग ज्यादा हो रहा है । नकारात्मक प्रभाव जल्दी हो जाता है । पानी को नीचे की ओर लाना एकदम आसान है लेकिन ऊपर चढ़ाने के लिए प्रयास करना पड़ता है , ताकत लगती है और इसके लिए मोटर पम्प की आवश्यकता पड़ती है । इसी प्रकार बाल साहित्य के नाम पर कुछ भी परोस देने से काम नहीं चलता । कम से केम 15 वर्ष तक गुरुकुल शिक्षा पद्धति के अनुसार बच्चों में न्याय , धर्म , नैतिकता , प्रेम , दया , करुणा , सत्यता , ईमानदारी , भक्ति , वैराग्य , निर्भयता , सहिष्णुता , सात्विकता , क्षमा , स्वाध्याय , उदारता एवं प्रसन्नता जैसे दैवी सदगुणों का विकास होना अत्यावश्यक है । तभी बाल साहित्य की सार्थकता है । केवल मनोरंजन व टाइम पास करना बाल साहित्य का उद्देश्य नहीं हो सकता ।
राष्ट्र व समाज के लिए एक श्रेष्ठ व उपयोगी नागरिक का निर्माण करना ही बाल साहित्य का उद्देश्य होना चाहिए । मेरे विचार से तो बचपन से ही गीता , रामायण , भागवत आदि धर्म गर्न्थो के साथ - साथ वीर , त्यागी व बलिदानी महापुरुषों की कथाएँ पढ़नी - सुननी चाहिए । यह भी बाल साहित्य ही माना जायेगा । बच्चों को चोरी , हिंसा , जुआ , व्यभिचार , नशाखोरी ,इत्यादि दुर्व्यसनों से बचा लेना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । इस प्रकार बाल साहित्य की प्रासंगिकता आज के समय में और भी बढ़ जाती है ।
' बालदेवो भव ' कहते हैं ,
बच्चे मन के सच्चे ।
बाल साहित्य के बिना ,
रह जायेंगे कच्चे ।।
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