स्थान _कोण्डागांव(छत्तीसगढ़)
ग़ज़ल
सर्द छींटों से बुझा दिल जलाती रहती है।
फ़र्ज़ अपना यूं ही, दुनिया निभाती है।
एक शिकस्त का ज़हर गले उतरता नहीं,
किसलिए रोज़ ये मुझको हराती रहती है।
ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है, आप दें कि न दें
ये बदस्तूर सबको आज़माती रहती है।
रश्क होता हैबारहा,सैलाबे_दरिया को
बेचारी आंख जो आंसू बहाती रहती है।
कौन कहता है वक्त चलता है हम चलते नहीं
थामके हाथ ये क़िस्मत चलाती रहती है।
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