जिला/शहर: मैसूर, कर्नाटक
विधा: कविता
शीर्षक: हिमालय
हिमालय
हिमालय तुम सच में कितने उन्नत हो,
नित अंबर को तुम गले लगाते हो,
अंबर भी शीश झुकाता है तेरे समक्ष,
धरा भी है तेरे आगे श्रद्धा से नत मस्तक।
तेरे चरणों को धोए विशाल हिंदमहासागर,
प्रकृति ने बिखेरी अपनी छटा निराली,सुंदर,
धवल बदली से भरा रूप तेरा मन हरती,
तेरे इस रूप को देखने,आंखें हैं तरसती।
तेरे आगे घनघोर घटा मचाते बड़ा शोर,
शुद्ध पवन भी बहता,सदा तेरे चारों ओर,
दिन में तुझ पर चमके सूर्य की किरणें,
चांद,सितारे करें तेरा भव्य स्वागत निशा में।
तेरा आंगन है,कितना शांत और पावन,
खड़े रहते हो सदा शान से सीना तान,
आंधी,तूफानों से तुम कभी नहीं डरते हो,
सबको धैर्य और साहस का पाठ पढ़ाते हो ।
सदैव प्रहरी बन,रक्षा करते हो मेरे देश की,
कैसे कर्ज चुकाएं तेरे इस महान उपकार की,
इस खूबसूरत वसुंधरा के स्वर्ग हो तुम,
मेरे भव्य भारत के सरताज हो तुम।
मेरे भव्य भारत के उज्जवल ताज हो,
देवताओं के पवित्र निवास स्थल हो,
हम सब भारतवासी करते नाज तुम पर,
हे उन्नत हिमालय!शीश झुकाते तुझ पर।
डॉ।। बी. निर्मला,
मैसूर,कर्नाटक।
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