ग्राम -बुलाँकी
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा- आलेख
विषय -"धनतेरस"
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*धनतेरस*
पारंपरिक संस्कृति के अनुसार हिंदू धर्म में धनतेरस के दिन धनवंतरी ,लक्ष्मी और कुबेर की पूजा की जाती है। इस दिन जो इन तीनों देवी -देवताओं का पूजा करते हैं ।उस घर में सुख -समृद्धि का वास हमेशा रहता है ।ऐसी मान्यताएं समाज में चली आ रही है। लेकिन विगत परंपरा से लेकर आज तक किसी भी परिवार में न तो सुख का प्रमाण है, न समृद्धि का प्रमाण है अर्थात संसार में कोई भी मनुष्य सुख समृद्धि के साथ नहीं जी पा रहा है। सुविधा और संग्रह से जीना हो रहा है। संग्रह से सुविधा की वस्तु की पूर्ति क्षणिक सुख के लिए की जाती है ।जो शरीरअपेक्षा होता है। संसार की समस्त संपत्ति से सिर्फ शरीर की पूर्ति कर सुविधा दी जा सकती है ।लेकिन जीवन को भौतिक वस्तु से सुख नहीं दी जा सकती है। जीवन और शरीर दोनों अलग-अलग वास्तविकता है ।शरीर से बड़ा जीवन होता है अतः जीवन शरीर को चलाता है। शरीर की सारी सुविधाएं संसार में उपलब्ध है ,लेकिन जीवन की सुख क्या है? अभी तक लोगों को सामान्य तौर से पता नहीं है। जबकि हर कार्य व्यवहार सुख के अर्थ में किया जाता है। हम कार्य और उत्सव सुख के लिए मनाते हैं। लेकिन सुख की प्राप्ति नहीं होती है। शरीर की सुविधा के लिए भौतिक वस्तुओं का इस्तेमाल होता है ।इसी भौतिक वस्तुओं को सुख मान कर जी रहे हैं ।जबकि भौतिक वस्तु शरीर का भाग है और जीवन के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है अर्थात समझ की आवश्यकता होती है ।समझ कर जीने से ही आदमी सुखी होता है ।आदमी को दोनों चाहिए शरीर के लिए सुविधा और मन के लिए सुख अर्थात ज्ञान हर मनुष्य के पास सुख और सुविधा दोनों होने से ही मनुष्य शांति से जी पाएगा ।हर मनुष्य एक ही दिन खुशी नहीं चाहता ।वह हर पल सुख पूर्वक जीना जाता है और मनुष्य उत्सव कार्यक्रम करके सुखी होना चाहता हैं ।क्षणिक सुख के लिए यही मानव जाति की विडंबना है। हर पल निरंतर सुख के साथ जीया जा सके इसके लिए कोई कार्यक्रम वर्तमान में नहीं दिखाई देता है ।विभिन्न प्रकार के पूजा-पाठ दान -दफान खाना-पीना में ही सुख ढूंढ रहे हैं ,लेकिन आज तक किसी को निरंतर सुख नहीं मिला है। सिर्फ शरीर जिंदा है ,मन सुखी से नहीं जी रहा हैं। अर्थात शरीर को सुख प्राप्त के लिए जिंदा रखे हैं ।मन हमेशा खुश होकर के नहीं जी पा रहा है। लेकिन खुशी की चाहत में जिंदा है। धनतेरस का मूल अर्थ है तेरह ज्ञान को जानना ,इस तरह ज्ञान को जानने से और जानकर मानने से एवं पहचान कर निर्वाह करने से हर मनुष्य सुख शांति के साथ जी सकता है ।हम किसी भी देवी देवता की पूजा उसकी आचरण से प्रेरित होकर करते हैं ,ना की प्रतीक और शरीर को। वर्तमान में कोई आचरण का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं और प्रतीक का पूजा कर रहे हैं, यही मनुष्य का भुलावा है। अतः मनुष्य आस्था, भय , प्रलोभन वश जीता हुआ भ्रमित है। अतः मनुष्य आस्था से विश्वास की ओर मन बनाता है ,तो वह विश्वास के साथ जीता हुआ सुख समृद्धि को प्रमाणित कर सकता है। तेरह ज्ञान इस प्रकार है। पांच इंद्रिय ज्ञान ,चार विषय ज्ञान,तीन ऐषणा ज्ञान और एक उपकार ज्ञान ।इस तरह से इन तेरह ज्ञान का अनुभव कर जो व्यक्ति इस तेरह ज्ञान के प्रकाश में जीता है ।वही व्यक्ति सुख समृद्धि का भागीदार होता है ।वर्तमान में तेरह ज्ञान कहीं भी देखने के लिए नहीं मिलता है ।इसको हर मनुष्य जांच कर देख सकता है ।अगर विश्वास होता है ,तो जीने के लिए इस ज्ञान को स्वीकारता है। विश्वास नहीं है तो जैसे जी रहे हैं, वर्तमान में वैसा जीए ,इसमें किसी को बाध्यता नहीं है ।यही तेरा ज्ञान धनतेरस के रूप में हर व्यक्ति स्वीकार कर निर्वहन करजी सकता है ।जिसकी निरंतरता से हमेशा सुख -समृद्धि की निरंतरता बनी रहेगी।
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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