रचनाकार श्रीमती रजनी शर्मा बस्तरिया
जिला रायपुर छत्तीसगढ़
शीर्षक ख्वाहिशें संदीली
विधा मुक्त छंद
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हर साल मौसम आते रहे बार बार
ख्वाहिश में भीगती रही सारी यादें
नवेली नवेली।
हवा,धूप से पर्दा कैसा बावरी
धानी चूनर ओढ़े फिरती है
शर्मिली शर्मिली।
चमकते फितरतों के नशानोश़
पता है तुम्हे क्यों होती है लुनाई
नशीली नशीली।
यादों के जंगलों में भीगी रोशनी
समझना जुगनुओं के सिर ताज़ है
कंदीली कंदीली।
चिलमन चिक आंखों के अश्क
चिलमीलिका से हुए क्यों न जाने
झिलमीली झिलमिली।
जुबां मिली जब नमकीनीयत से
तब पता चला आंखें क्यों हुई
पनीली पनीली।
उकेर गईं बारिशें जब नाम तुम्हारा
ख्वाहिशें महक उठी जाने क्यों
संदीली संदीली।।
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