स्थान- कचंदा
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा- कविता
शीर्षक- आत्म ज्ञान
आत्म ज्ञान
चिंता से चालाकी घटे, कष्ट घटाये शरीर ।
बात मेरी मान जा, मत हो तू अधीर ।
मत हो तू अधीर , तू अपने को पहचान ।
सर्व शक्ति अंतर बसा, कर ले आत्म ज्ञान ।
कह "प्रधान" कविराय, तभी होगा उद्धार ।
जीवन अपना बना ले, कर ले नव सुधार ।
जिसे लोग समझते थे , चरणों की धूल ।
वही निकला बाद में नयनों की फूल ।
नयनों की फूल, विसराया खुशबू देश में ।
वह साक्षात् देव बना मानव के वेश में ।
कह "प्रधान" कविराय, पहले मूर्ख नादान।
पढ़ा-लिखा सुकर्म से , बना बहुत महान ।
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