पता-------- -- कसडोल, छत्तीसगढ़
विषय ------- लोक कलाकार
शीर्षक ----- वाद्ययंत्र संग्राहक -- रिखी क्षत्रिय
________________________________________
भिलाई , छत्तीसगढ़ के लोक कलाकार श्री रिखी क्षत्रिय जी आज सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरी दुनिया में लोक वाद्यों के वादन व संग्राहक के रूप में जाना - पहचाना नाम है ।
रिखी जी का जन्म सात मई सन् उन्नीस सौ उनसठ में ग्राम -सलौनी , खैरागढ़ में हुआ । उनके पिता श्री मेघनाथ क्षत्रिय जी रामायण मंडली में गायन करते थे । बचपन से ही रिखी जी पिता के संपर्क में रहकर वाद्ययंत्रों को बजाना सीख लिया था । 9 वर्ष की उम्र में ही विभिन्न वाद्ययंत्रों की उन्हें जानकारी हो गयी थी । उनकी प्रारंभिक शिक्षा भिलाई में हुई , खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय से उन्होंने लोक संगीत में एम . ए. आनर्स की शिक्षा प्राप्त की तथा तबला में विद की उपाधि प्राप्त की ।
विभिन्न लोकवाद्यों को जानने की उत्सुकता से उन्होंने लोकवाद्यों के एक संग्रहालय की स्थापना की । उक्त संग्रहालय में मांदर ,गुदुम ,रामधुनी , शंख , झालर , तुर्रा ,ढोक , डुगरू सहित 175 वाद्ययंत्र है । जिसमें सबसे छोटा कुहुकी ( डेढ़ इंच का ) व सबसे बड़ा माडिया ( 5 फीट का ) वाद्ययंत्र है । कुहुकी वाद्ययंत्र के नाम पर ही अपने संग्रहालय का नाम " कुहुकी कलाग्राम " रखा है । आदिवासी कला व कलाकार की पहचान को विलुप्त होने से बचाने के लिए उन्होंने सन् 1985 में लोक रागिनी की स्थापना की । आज देश विदेश में लोक रागिनी के कलाकार लोककला के माध्यम से विभिन्न लोककला व वाद्ययंत्रों को जीवित रखें हुए हैं ।
भिलाई इस्पात संयंत्र से सेवानिवृत्ति पश्चात् रिखी जी वर्तमान में अपने निवास में बस्तर हस्तशिल्प का उद्योग व विक्रय केन्द्र का संचालन कर रहे हैं । जहां देश विदेश से कलाप्रेमी आते हैं व विभिन्न वाद्ययंत्रों व लोककला का लुत्फ उठाते हैं ।
कला के क्षेत्र में रिखी जी प्रधानमंत्री व महामहिम राष्ट्रपति के हाथों राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों सम्मान प्राप्त कर चुके हैं । छत्तीसगढ़ सरकार भी उनकी कला का आदर करते हुए विभिन्न सम्मान प्रदान किये हैं ।
छत्तीसगढ़ के लोककला व वाद्ययंत्रों को संजोकर रखने वाले ऐसे महान कलाकार हमारे छत्तीसगढ़ के धरोहर है । रिखी क्षत्रिय जी पर छत्तीसगढ़ ही नहीं वरन् पूरे देश को गर्व है ।
No comments:
Post a Comment