Thursday, November 5, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- सुख-दुख की लहरें

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
     विधा - मुक्त कविता 
   शीर्षक - " सुख-दुःख की लहरें "
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उतार-चढ़ाव से भरी जिंदगी, 
कभी गिरना तो कभी सम्हलना है। 
ज्वार-भाटा सी लहरों की, 
पल में चढ़ना पल में उतरना है।। 

कभी हंसना तो कभी रोना है। 
मिट्टी के बिस्तर में अंतत: सोना है। 
जी ले जिंदगी को खुश मिजाज से, 
ये मत सोच कल क्या होना है।। 

घबराना न तू कठिन क्षणों में, 
आज दुःख तो कल खुशी की लहर है। 
है आत्मविश्वास तो अमर दुनिया, 
बिना इसके जिंदगी जहर है।। 

लड़ना सीख तू परिस्थितियों से, 
हौसला बनाये रखना। 
हिम्मत न हारना जिंदगी में कभी,
चेहरे में मुस्कान सजाये रखना।। 

उमंग है मलंग है। 
जिंदगी लहरों की तरंग है। 
कभी सुनामी-सी भयावह, 
तो कभी इंद्रधनुषी सतरंग है।।

सुरमयी सुर की साज है। 
कान्हा की मनमोहनी राग है। 
कभी ज्वालामुखी कभी तूफान,
कभी बुझाती दुःखों की आग है।। 

हर समस्या का समाधान है। 
लहरों में भी आती व्यवधान है। 
सीना चीर पत्थर का भी लहरें, 
बना लेती अपनी पहचान है।। 
                                                 
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मौलिक रचना (स्वरचित) 
संतराम कुम्हार 
बलौदाबाजार (छ.ग.)

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