जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-प्रवाह
विधा-संस्मरण
महानदी उफान पर था।नदी का तट कटता जा रहा था ।उफनती जलराशि ऐसे दिखाई दे रही थी,मानों नदी चाय बना रही हो ।
पापा को नन्हीं बच्ची ने जिद्द किया,मुझे आपके साथ सरोना सामान खरीदने जाना है ।नाव पर बैठना है और नदी के बाढ़ में बन रहे चाय को छूकर देखना है ।
पापा ने बच्ची की बात मान ली।साइकिल में 3किमी यात्रा तय कर वो महादेव घाट भी आ गया,जहां तैर कर नदी पार कर हाईस्कूल पढ़ने जाते थे ।नदी का तीव्र प्रवाह कभी मिक्चर के सेव जैसा तो कभी चाय जैसा दिखता ,वह बच्ची बहुत खुश हुई।
नाव में सवार होकर नदी के हिचकौले खा उफान देखने का आनंद अवर्णनीय था।सरोना से किराने का सामान लेकर वापस धनेसरा लौटना था।
तट पर पता चला नाव की आखरी खेप है ।पापा ने मल्लाह को आवाज दी।वह वापस आया ,साइकिल,पापा,बच्ची और किराने का सामान नाव पर थे।नदी का तीव्र प्रवाह था।नाव डगमगाता आगे बढ़ रहा था ।बीच धार में नाव पलट गई।सूर्य अस्ताचल की ओर अग्रसर था।
बच्ची डूब गई थी ।फ्राक ऊपर दिखाई दे रहा था ।पापा तैर कर बच्ची को ऊपर उठा लिए।नाव को ठीक कर बच्ची को बैठाये ।तैरकर एक सहयोगी ने साइकिल बाहर निकाला।किराने का सामान बह चुका था ।रेवड़ी,किसमिश,छोटे भाई का ग्राइफ वाटर सब बह चुका था ।
नदी का प्रवाह देखने का सपना पूरा हो गया था ।उस सुपर हीरो पापा ने नया जीवन दिया था ।
आज भी वो महादेव घाट का नदी तट व महानदी का तेज प्रवाह याद है ।
सुपर हीरो पापा तो आज नहीं है किंतु वो बच्ची मै ही थी।
आज भी उस घटना को याद कर सिहर जाती हूँ ।
मीराआार्ची चौहान
कांकेर,छग
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