स्थान-नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला-- जांजगीर-चांपा/छत्तीसगढ़
विधा--कविता/लेख
विषय--भ्रष्टाचार की राजधानी
शीर्षक-भ्रष्टाचार की राजधानी
भ्रष्टाचार की राजधानी,हम तुम और सब है ।
दे रहे दिन रात बढ़ावा, हम ही उसके रब है ।
हम इसका सहारा लेकर,सोच रहे आगे जाना ।
भ्रष्टाचारी व्यक्ति का फिर,बन रहे हां निशाना ।
हमारे ही मन में, भ्रष्टाचार की बातें लबालब है ।
जब सोचोगे इस दृष्टि से, भ्रष्टाचार बंद हो जायेगा ।
सभी जगह कहते भ्रष्टाचार,वह रह नहीं पायेगा ।
स्वीकार रहे लोग लेना देना,हो रहा यह तब है ।
हर युग में भ्रष्टाचार था,झूठ कपट की बेड़ियां ।
जन्म हुआ है विकास होगा, चलता रहेगा दुनियां ।
खुले आम अधिकार सा लूटते,ये बात अब है ।
भ्रष्टाचारी देश में लाखों, लगे आरोपों से जान रहा ।
आंखे बंद है क्या करोगे,सारी दुनियां पहचान रहा ।
उल्टी उनकी दुनियां, बेहतर और सबसे चकाचक है ।
समय रहते रोकना होगा, आगे बढ़कर टोकना होगा ।
गज की तरह अपने मद में, हमको जरुर रहना होगा ।
जहां होते रोग सुनलो,उसकी दवा भी होती जग है ।
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