जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - मुक्त कविता
शीर्षक - " भ्रष्टाचार की दुनिया "
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जहाँ देखो वहाँ देखो,
भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है।
गंदी राजनीति के दलदल में,
सब मिली भगत सरकार है।।
गरीबों तक उनका हक नहीं पहुँचता।
आॅफ़िसर अपने ही जेबें भरता।
हर जगह लूट और तिरस्कार है।
गरीबों का न कोई आधार है।।
विकास योजना से वंचित किसान रह जाते।
लाभ न कोई उसका उठा पाते।
अनभिज्ञ बनता योजना का ही जानकार है।
गरीब क्यों बेबस और लाचार है।।
गरीबी कार्ड अमीरों के नाम की।
ऐसी भी योजना भला किस काम की।
नहीं मिलता चावल जिनका वास्तव में अधिकार है।
ऐसे तो होता ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार है।।
जर्जर सड़क पर चलते लोग गाँव सुदूर के।
कच्ची,गड्ढे वाली सड़कें ओ रामपुर के।
फाइलों में तो पूर्ण होता सड़क का आकार है।
असलियत में देखो तो सड़क निराधार है।।
रिश्वत बिना कोई काम नहीं होता।
आॅफिस में कर्मचारी दिन में भी सोता।
घंटों करना पड़ता उनका इंतजार है।
विलंब आना तो उसका पुराना व्यवहार है।।
नौकरी मिलती सिफारिशें और घूस से।
पता भी नहीं जिसे पिता कौन लव-कुश के।
दर-दर भटकता योग्य उम्मीदवार है।
काबिलियत आज क्यों बेरोजगार है।।
वोट नोटों से आज खरीदे हैं जाते।
पैसा से ही अपनी सरकार हैं बनाते।
फिर यही नेता बनते घूसखोरों का सरदार है।
भूल जाते अपने कर्त्तव्य,
छोड़ देते जनता से प्यार है।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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