सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा- मुक्त काव्य
विषय-भ्रष्टाचार की राजधानी
चारो ओर फैला गोरखधंधा है
ईमानदारी का व्यापार मंदा है
किस-किस पर उठाएं उंगली
हर तरफ यमराज के बंदे हैं
चूहों की तरह कुतर रहे ये
नुकीले ,पैने हो गए दांतो से
बेईमानी का खून लग चुका
लार टपकाती इनकी ज़ुबानों में
चुनाव आते ही पहुँच जाते हैं
वोट का कटोरा हाथ लिए
घर-घर माई -बाप बनाते हैं
झूठे वादों की पोटली लिए
कुर्सी हाथ आते ही बैठ जाते हैं
अपने भ्रष्टाचार की राजधानी में
लोगो की जरूरतों को चूस-चूस
अपना घर का पिटारा भरते जाते हैं
स्विस बैंकों में रुपया भरते हैं
छुट्टियां विदेशो में मनाते हैं
कल तक दाल रोटी नसीब ना थे
अब छप्पन भोग से थाल सजाते हैं
लोगो का हक मार -मार ये
अपना साम्राज्य चलाते हैं
भ्रष्टाचार की राजधानी में बैठ
देश को ही खोखला करते जाते हैं।
No comments:
Post a Comment