सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-मुक्त काव्य
विषय-कागज की कश्ती
शीर्षक-जाने कहाँ खो गई........
वो झाग भरे गन्दे जल में
मेरी उम्मीदों वाली कागज की कश्ती
जाने कहाँ खो गई?
मेरे बचपन वाली सावन की मस्ती
छूट गए वो सखी-सहेलियां
रूठ गए वो खेल खिलौने
जिन रिमझिम फुहारों में भीगते थे हम
जाने कहाँ खो गए वो पल सुहाने
वो स्कूल की घण्टियाँ
सहेलियों संग मस्तियां
वो खिलखिलाती सी हंसी
जाने कहाँ खो गई वो बेपरवाह जिंदगी
वो बड़ो का प्यार ,आशीर्वाद
घर मे ही बसता खुशियों का संसार
वो किस्से ,वो कहानियां
जाने कहाँ खो गई मेरी कागज की कश्तियां।
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