संबलपुर,जिला-कांकेर,(छ. ग.)
विषय-चिलमीलिका
दिनाँक-10.11.20
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*चिलमीलिका*
घोर अँधेरी रातों में,
चिलमीलिका जब आती है,
उल्लास,चपल,उन्माद भरा
उजास बन छाती है।
सावन भादों की तम भरी रातों में
बादलों से छाया होता नभ,
मुँह छुपाएं दिनकर का
धरा पर जब होता लोप।
चाँद भी बदली में मुँह छुपाती
जब छाती घटाघोप,
सौदामिनी की दमक,
सूरचाप की चमक होता आलोप।
तब अपनी चमक बिखेरता
छोटा सा कीट खद्योत,
थके हारे मन को
प्रफुल्लित कर भरता उजास।
दीपशिखा सी प्रदीप्त हो
उर का कोना-कोना,
घनी अँधेरी रातों में चमक
उठता है वह बन सोना।
अरूण रवि का आभा लिए
कभी जलता कभी बुझता अनायास,
प्रलय पयोद समेटे गगन में
होते झंझावात तब खद्योत करते प्रकाश।
*व्याख्या*-प्रस्तुत कविता में खद्योत के
जलते-बुझते प्रकाश,अंधरे में अपना
प्रकाश फैलाते है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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