जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - मुक्त कविता
शीर्षक - " कागज की कश्ती "
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बचपन की वो मस्ती।
यारों के संग मेरी ओ बस्ती।
चलते थे नाव हमारे भी जब,
नालियों में कागज की कस्ती।।
पुराने कागज से नाव बनाते।
मजा ले लेकर उसको तैराते।
बन जाता कस्ती हमारी जब,
दोस्तों यारों को भी तरीका सिखाते।।
छुट्टी की जब घंटी बजती।
बस्ता पकड़कर छोटी चलती।
खेल-कूद करते शाम तक हम,
मना हमारी माताएँ करती।।
बारिश की ओ सुंदर फूहारें।
झागों भरी धाराओं की किनारें।
लहरों के बीच चलती मेरी कस्ती,
बहुत अमीर बचपन भी हमारे।।
खुशी बचपन की जिसका मोल नहीं।
महंगे खिलौने से जिसका कोई तोल नहीं।
सम्हाले रखा हूँ मस्ती की हर यादें,
जान बसती भले हीरे-सा अनमोल नहीं।।
नाव जब किसी पत्थर से टकराती।
मन में हमारे उदासी छा जाती।
देते दिशा खुद अपने हाथों से ही,
स्वयं रास्ता बनाना ये हमें सिखाती।।
जीवन भी एक कस्ती है।
मुश्किलों से भरी राह होगी।
कर सामना हर चुनौती का,
फिर कस्ती कभी न गुमराह होगी।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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