निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विधा--छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक--"कागज की कश्ती " ।
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~~~<<<•कागज की कश्ती •>>~~
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बचपन के दिन होते कितने सुहाने,
हर मौसम में,करते मस्ती,
बरसात में भीगने का मज़ा,
और बहते पानी में,
कागज की कश्ती छोड़ना,तैराना,
कभी नदी,तो कभी तालाब में,
तो कभी वर्षा के बहते पानी में,
जब कागज भींग जाता और कश्ती,
डूब जाती,होता था,दु:ख बहुत ।
कभी-कभी किसी की जिन्दगी,
बन जाती है,कागज की कश्ती,
जीवन के मंझधार में,चले जिन्दगी,
हिचकोले मारते और हो जाए,
फिर फना जिन्दगी --।
बिहार में,बाढ़ ने,किया जो हाल--
तट किनारे बसे गाँव--
उनके मिट्टी के मकान ,झोपड़ियां,
कागज की कश्ती,की तरह--
कुछ बाढ़ में बहते चले गये और---
कुछ पूरी तरह से डूब गए,
ऐसी होती है,जीवन की कश्ती--।
आज कुछ लोगों का पारिवारिक जीवन,कागज की कश्ती,की तरह से,
डगमगाती हुई,चलती है और---
तनावग्रस्त रहते व खुशियों के बदले,
अवसाद में रहते और मंजिल तक-- पहुँचने से पहले,मंझधार में डूब जाते।
कागज़ की कश्ती और जीवन दर्शन,
बारिश का पानी व जीवन सफ़र --
कितने मेल,आपस में खाते हैं,
दोनों में,हरपल,मिटने का का डर होता
यही तो,जिन्दगी का अनूठा सफ़र-- होता,जिसका अन्त दर्दनाक होता --।
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व्याख्या--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि कागज की कश्ती एक जीवन दर्शन है और मानव जाति के लिए एक संदेश भी बन जाता है ।
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