संबलपुर,जिला-कांकेर,(छ .ग.)
दिनाँक :- 09.11.20
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~ •°• *ज्ञान* •°• ~
ज्ञान का दीप जला,
तिमिर हरण कर,
कर पथ प्रदर्शित,
मन स्वाभिमान से भर।
हे विद्या के देवी,
माँ वागेश्वरी,वर दे,
ज्ञान की ज्योति
जग को आलोकित कर।
दो आशीष मुझे
ज्ञान पूँज जला सकूँ,
अज्ञानता के अंधेरे में
उजास फैला सकूँ।
तिमिर भरी निशा में,
जब छाया घोर अंधेरा ,
ज्ञान पूँज की अमर ज्योति से
झलक उठा सबेरा।
ज्ञान के आगे अज्ञानता भागे,
सत्य,शिव सुन्दरम साधे,
ज्ञान से स्वाभिमान,
सौंदर्य हो सबसे आगे।
मैं अटल भाव भरा,
अचल चाव मेरा,
प्रचंड और प्रबल, और हूँ
प्रकांड,अटल,अचल सत्व मेरा।
*व्याख्या*- प्रस्तुत कविता में ज्ञान का दीप जला ,तिमिर दूर करने की बात की गई है।ज्ञान के आगे सत्यं, शिवं, सुंदरम साधे जा सकते है।ज्ञान अटल,अचल,प्रचंड,और प्रबल है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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