02. राज्य- छत्तीसगढ़, भिलाई
03. रचना का शीर्षक- स्वर, व्यंजन, सिद्ध-कविवर की महत्ता
कविता
स्वर, व्यंजन, सिद्ध-कविवर की महत्ता
(स्वर, व्यंजन, मात्रा और व्याकरण के लोप या अशुद्धि होने से तीनों लोकों पर पड़ने वाले प्रभाव का गहन अन्वेषण)
स्वर, व्यंजन, मात्रा और संधि की, आपस में छिड़ी लड़ाई
अनुस्वार, अनुनासिक ने भी, एक -दूजे की खूब खिंचाई
मैं हूँ सबसे वर्ण महान, क ने ज्ञ को, इ ने ई को ऐसे बोला
शब्द बिगड़ अपशब्द बने, आसव में जैसे गरल हो घोला
मैं-मेरा, तू-तेरा, तू-तू मैं-मैं, वर्तनी बिगड़ी, पहाड़ बन गया राई
दामन छोड़ा एक दूजे का, वर्ण सवर्ण बने; छूट गई मिताई
हाहाकार मचा तीनों लोकों में, 'र' खोकर सूरज गया था सूज
चाँद बना चंद; तारे तार; नदिया दिया, और खर बना खरबूज
शिव 'इ' बिन शव बने ब्रम्हा-बहा, विष्णु-अणु बनकर बेहाल
यमराज 'यज' को खोकर 'मरा' बने 'पा' खोकर; ताल पाताल
इंद्रदेव का आसन डोला 'स' बिन आसन बिन 'आन' रह गया
परमपिता के शरण देव हुए, उनका गुमान बस 'मान' रह गया
बिजली कौंधी दूर क्षितिज तक, हुई गगन में आकाशवाणी
मरीची तुम ना जहां पंहुचे;पंहुची, कवि-काव्य-कवोष्न-वाणी
वर्ण विज्ञवर होते कविवर, वे ही देंगे तुमको; मनोवांछित वर
कविश्रेठ ही सुलझाएगा, वर्ण-शब्द-वाक्य-व्याकरणिक स्वर
सुमन वृष्टि हुई गगन से, स्वर व्यंजन का हुआ पुनर्स्थापन
श्रमसाध्य कर्म कर आल्हादित थे,कविवर-सिद्ध-ऋषिगण
ब्रम्हा, विष्णु, शिवशंकर ने सस्वर की मधु-मधुर काव्य स्तुति
तीनों लोक में अनहद नाद की, ध्वनित हुई आदि-अनादि आवृत्ति।
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