स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"दुनिया"
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हे प्रभु ये कैसी दुनिया गढ़ी ।
इस पर ईर्ष्या,द्वेष,अहंकार भी मढ़ी।
क्या होगा संसार का,ये सोंच पुष्पा डरी।
हे प्रभु ये कैसी दुनिया गढ़ी।
समय नही यहाँ किसी के लिए।
अपनों से अपनापन नहीं ।
सब को स्वयं की ही पड़ी ।
हे प्रभु ये कैसी दुनिया गढ़ी।
मशीनों में ही ध्यान लगा।
धन कमाने से फुर्सत नहीं।
मानव बन कर रह गया एक घड़ी ।
हे प्रभु ये कैसी दुनिया गढ़ी।
बदल दे दुनिया के ये चलन।
कर ले थोड़ा आत्ममंथन।
कर जोड़ पुष्पा करती निवेदन ।
वरना हो जाएगी देर बड़ी।
हे प्रभु ये कैसी दुनिया गढ़ी।
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