स्थान- कचंदा
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा- कविता
शीर्षक- जीवन की आस
जीवन की आस
मेरे खून-पसीने की कमाई लूट गई आज ।
मेरे सुखमय जीवन में गिर गया है गाज ।।
सभी साथ छोड़ चले अब सहारा कौन है ?
तन शिथिल अब मेरा मनोमस्तिष्क भी मौन है ।
भाग्य भी मुझसे अब हो गया है नाराज ।
मेरे सुखमय जीवन में गिर गया है गाज ।।
कौन निकालेगा मुझे इस घोर संकट से ?
कौन छुड़ाएगा मुझे इस क्रुध कंझट से ?
अब मेरा कौन है किसको दूँ आवाज ।
मेरे सुखमय जीवन में गिर गया है गाज ।।
स्वार्थ की इस दुनिया में किसे अपना मानूं ।
किस पर करूँ अब यकीन किसे अपना जानूं ।
मेरी दुर्दशा को देखकर भी चुप है समाज ।
मेरे सुखमय जीवन में गिर गया है गाज ।।
दे दे नवजीवन प्रभु तेरी शरण में आया हूँ।
भूलकर सब दुःख दर्द तुझमें ही समाया हूँ ।
सुखमय जीवन दे दे , फिर तू आज ।
मेरे सुखमय जीवन में गिर गया है गाज ।।
फिर से मेरे जीवन को कर दे बहाल ।
काट दें मेरे सभी दुर्भाग्य के जाल।
पहना मेरे सर में खुशियों की ताज।
मेरे सुखमय जीवन में गिर गया है गाज ।।
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