जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - मुक्त कविता
शीर्षक - " अंतरिक्ष "
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गगन अंत से शुरुआत होती,
तेरा न कोई अंत है।
है दुनिया रहस्यों भरी,
अंतरिक्ष तू अनंत है।।
सौरमंडल और आकाशगंगा,
रहते साथ पूरा परिवार है।
तारे टिमटिमाटे नभ-आकाश पर,
जैसे दीपावली का त्यौहार है।।
ग्रह, उल्कापिंड और तारे,
तुझमें ही समाया है।
सूरज की गर्मी, चाँद की ठंडक,
अनोखा सामंजस्य बनाया है।।
सबसे अनोखा पृथ्वी हमारी,
जीवन इसकी पहचान है।
खगोल विज्ञान की ज्ञान लेकर,
बना लिया अंतरिक्ष यान है।।
चाँद को चकोर-सा बहुत टक लिए,
अब आसियाना उसमें बनाना है।
चाँद को छूने अपने हाथों से,
अंतरिक्ष मिशन चलाना है।।
सन् २०२२ तक मानवरहित,
गगनयान, गगन में लाना है।
विश्व पटल पर भारत का,
तिरंगा प्यारा लहराना है।।
है अनुपम यह ब्रह्मांड की दुनिया,
खगोदविदों ने भी माना है।
मंगल ग्रह पर जीवन की,
एक नई बस्ती सुंदर बसाना है।।
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मौलिक रचना (स्वरचित)
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
Bahut sunder
ReplyDeleteThank-you mitra
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