Monday, November 9, 2020

जंगल दरोगा -श्री ज्ञान प्रकाश पटनायक (जीवनी): पुष्पा पटनायक

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- जीवनी
शीर्षक -"जंगल दरोगा -श्री ज्ञान प्रकाश पटनायक "   
*************************                         
        आज मुझे मेरे श्री ज्ञान के शान के बारे में बताने का मौका मिला है । मैं धन्य हूं कि श्री ज्ञान के कारण मुझे इतने सुंदर संसार का हिस्सा बनने का मौका मिला ।उनके दिए संस्कार और प्यार ने मुझे सिंचित और मार्ग प्रशस्त किया कि, आज मैं उनके बारे में आपको बताने के काबिल हो पाई हूं।
        .श्री ज्ञान जी यानी जिस व्यक्तित्व की बात मैं कर रही वो कोई और नहीं मेरे पिताजी हैं।उनका पूरा नाम ज्ञान प्रकाश पटनायक है। उनका जन्म 17 फरवरी सन 1951 को हुआ था। उनके पिता श्री रामचंद्र पटनायक, जंगल दरोगा  एवं माताजी श्रीमती वैदेही पटनायक एक गृहणी थी।  राम एवं वैदेही के दो पुत्र एवं पांच पुत्रियों में श्री ज्ञान दो बड़ी बहनों के बाद तीसरी संतान थे।सीता- राम जैसे माता-पिता से इन्हें भरपूर प्यार और संस्कार मिला । श्री ज्ञान  बड़ी दो बहनों के बाद पैदा हुए भाई की मृत्यु के 3 साल बाद पैदा हुए थे ।इसलिए बड़े लाड़-प्यार से इनका पालन पोषण हुआ। प्यार से इन्हें दाऊ बुलाया करते थे। 
                  उनका बचपन कई स्थानों में बिता ,उनके पिताजी  जंगल दरोगा थे और स्थानांतरण की वजह से उनकी प्रारंभिक पढ़ाई ऐसे ही घूम-घूमकर अलग -अलग स्थानों पर पूरी हुई । दोनों भाई में बड़े होने के नाते बचपन से ही अपने माता-पिता एवं भाई-बहनों के प्रति ज्यादा गंभीर एवं सहयोगात्मक रवैया रहा । बचपन से ही  अन्य बच्चों की तुलना में इनका व्यवहार बिल्कुल अलग दिखाई देता था ।उनका स्वभाव अन्य बच्चों की तुलना में अलग था ।वे अपनी उम्र से बड़े बच्चों के साथ बातें करते थे और उनके साथ रहना उन्हें ज्यादा पसंद था ।अन्य बच्चे गिल्ली डंडे बाटी लुकाछिपी  तरह- तरह के खेल खेला करते थे ,तब ये हम उम्र बच्चों से बिल्कुल अलग रहकर बड़ों के पास बैठ कर बातें किया करते रहते थे । 
 श्री ज्ञान की मैट्रिक तक की पढ़ाई रायगढ़ के म्युनिसिपल  स्कूल एवं स्नातक की पढ़ाई रायगढ़ के डिग्री कॉलेज में हुई। वह मध्यम स्तर के विद्यार्थी थे,लेकिन उन्हें पुस्तक पढ़ने का बहुत शौक था ।उन्हें पुस्तकों से विशेष लगाव था ,इसलिए खाली समय में वे विभिन्न विषयों की किताबें पढ़ा करते थे। जिससे उन्हें विभिन्न विषयों का ज्ञान था ।उन्होंने भारतीय ग्रंथों के अलावा बाइबिल, कुरान ,मनुस्मृति एवं आयुर्वेद की पुस्तकों को आत्मसात कर लिया था।
       स्नातक समाप्ति के समय उनके पिता जी आदरणीय श्री रामचंद्र जी रिटायर्ड के समीप थे अतः उन्होंने जंगल विभाग के दरोगा के पोस्ट के लिए आवेदन किया और इतफाक  देखिए उनकी मंशा पूरी भी हुई । पिताजी के रिटायर होते ही वह जंगल के दरोगा बन गए और उन्होंने घर की जिम्मेदारी उठा ली ।उनकी पहली नियुक्ति तत्कालीन मध्य प्रदेश में सिवनी जिला के बरघाट में हुई थी। जहां से उन्होंने अपने कार्य और अपने भाई बहनों माता-पिता का भी ध्यान रखा ।पैसों से आर्थिक सहायता की एवं अपने से छोटे तीन बहनों एवं एक भाई को संरक्षण एवं संस्कारित करते रहे। सन 1978 रामनवमी को उनकी शादी उनके माता-पिता की मर्जी से श्रीमती दुलारी देवी के साथ हुआ।
       जंगल विभाग में उनकी लोकप्रिय होने के पीछे उनके स्वाभिमानी एवं निडर प्रकृति थी । वह अपने अधिकारियों की चापलूसी करना कतई पसंद नहीं करते थे ।उनमें गजब की फुर्ती थी। वह जंगल साइकिल से आते-जाते थे ।सायकिल से ही ट्रकों को आगे बढ़कर रोक लेते थे। सन 1982 अगस्त में उनके द्वारा लगवाए गए बेहतरीन वृक्षारोपण के लिए म.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अर्जुन सिंह के हाथों गोल्ड मेडल से सम्मानित भी हुए थे।बाद में अच्छे कार्य के कारण उनकी पदोन्नति उपवन क्षेत्रफल एवं वन क्षेत्रपाल में हुई।
         जंगल विभाग भी पुलिस विभाग की तरह ही था ।24 घंटे की ड्यूटी रहती थी। वे हमें ज्यादा समय नहीं दे पाते थे, पर हमारी सारी जिम्मेदारियां सही तरीके से पूरी करते थे ।मेरी मां कहती थी कि वे कभी उन्हें बाहर यात्रा पर नहीं ले गए पर मेरी और माता जी की नजर में वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाले इंसान थे जो माताजी को  गौरान्वित कर जाता था और आज मुझे भी करता है।मैंने कभी भी उन्हें अपने मित्रों या अपने रिश्तेदारों के साथ मौज -मस्ती में रमें नहीं देखा। वैसे भी उनके दोस्तों की संख्या बहुत कम थी । उनसे जुड़े हुए घनिष्ट लोगों में उनके विभाग में काम करने वाले निचले स्तर के लोग जैसे नाका ,चपरासी ,बाबू वगैरह थे ।एवं दूसरे अन्य लोगों में भी उनकी घनिष्ठता  निम्न तबके के लोगों के साथ ज्यादा गहरी थी। उन्होंने कभी भी दिखावा नहीं किया ।वे जैसे बाहर से दिखते थे, वैसे ही अंदर से भी थे।
            मैं उनका एक वाकया इसमें अवश्य डालना चाहती हूं । यह घटना तब की है जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ रही थी पिताजी की पोस्टिंग लुड़ेग जिला रायगढ़(वर्तमान में जशपुर )में थी । एक दिन उन्होंने सागौन लट्ठे से भरा ट्रक पकड़ा और उसे जब्ती कर लिया ।मालिक ने घूस देकर छुड़ाने की कोशिश की पर नाकाम रहा। तब उस क्षेत्र के विधायक जी आए और उन्होंने भी कुछ ऐसी ही बात रखी। लेकिन पिताजी नहीं माने तब उस विधायक ने ट्रांसफर करवाने की धमकी दी और चला गया पर पिताजी अपने बात पर कायम रहे ।विधायक की  धमकी भी उनकी कर्तव्यपरायणता को हिला न सकी। अंततः वह अपनी काली करतूत से बाज नहीं आया 1 दिन पिताजी जंगल से  एच डी मोटरसाइकिल में अपने एक फॉरेस्ट गार्ड के साथ लौट रहे थे । तभी 8- 10 आदमी अचानक सामने आ गए उनके हाथों में तांगा सब्बल वगैरह थी । उन्होंने पिताजी पर वार करना चाहा पर इन्होंने  बहादुरी पूर्वक अपनी चमड़े की बेल्ट निकालकर अपनी एच डी  मोटरसाइकिल को बड़े जोर से गोल -गोल घुमाते रहे और एक हाँथ से बेल्ट घुमाते रहे, कुछ देर में वे लोग डर गए और भाग खड़े हुए पिताजी को टांगे से  थोड़ी बहुत चोट भी आई और उनके बेल्ट के टुकड़े - टुकड़े हो गए । बाद में पुलिस केस हुआ नाका विधायक का आदमी निकला और उसने पापा के खिलाफ झूठी गवाही दी कि साहब ने एक लकड़ी चोर को बेल्ट से इतना पीटा की बेल्ट के टुकड़े टुकड़े हो गए ।इसी बात पर पिताजी को 1 वर्ष के लिए सस्पेंड होना पड़ा था।
               वे हमेशा कहते थे प्राण भले चली जाए पर इज्जत कभी मत खोना। स्वाभिमान बना के रखना । सन 2011 में फरवरी को वे कार्यमुक्त हो गए कार्य मुक्ति के बाद वे अपने पैतृक गांव बनाई आकर बसे तीन बेटी और दो बेटों के भरे पूरे परिवार में  खुश थे ।तभी 2013 जुलाई में मेरी माता जी उनकी पत्नी श्रीमती दुलारी देवी जी का स्वर्गवास हो गया ।अपनी भार्या के जाने के बाद भी उन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन बड़ी तन्मयता के साथ किया। दो बेटियों और एक बेटे की शादी की मैं उनकी बड़ी बेटी उनकी सेवा करती रही तभी एक दिन उनकी तबीयत अचानक खराब हुई इलाज कराने पर पता चला कि उन्हें लीवर  कैंसर हो गया है ,और वे सिर्फ 1 महीने के मेहमान हैं ।
             आखिरी समय में भी उनके चेहरे पर वही तेज और मुस्कान छाई रही ।अंततः 23 जनवरी  2019 को वे परलोक सिधार गए ।उनके शब्द आज भी याद है:-" गीदड़ की नहीं शेर की तरह जियो, जिंदगी की भीख मांगने से अच्छा है मौत से आंखें मिलाओ"।

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...