निवास-बैरन बाजार,रायपुर ।
जिला- रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विधा- मुक्त ।
शीर्षक:-" लहरें " ।
========÷÷÷÷÷÷÷÷======
~~~~~|||•लहरें •|||~~~~~~
*********
चार दिन की जिंदगानी---
मत कर,तू इस पर गुमान,
सारा धन-दौलत यहीं रहेगा,
मौत की लहरें,जब--
तेरे जीवन में आयेगा --।
नीरव झील में,बीचों-बीच---
जब तुम,पत्थर को फेकोगे ,
केन्द्र से उठती लहरें,
किनारे से,मिलने होती बेताब--।
सुनामी जब सागर में आती---
तुफानी सी उठती ऊँची-ऊँची लहरें,
तटीय क्षेत्रों में,कर देती तबाही,
प्रकृति अक्सर देती ,इसकी गवाही--।
चुनौतियां,समस्या व संघर्ष---
जीवन में,आती हैं,ऐसी भी लहरें,
तब होता है,बचना कितना मुश्किल,
पर,जिसका हौंसला हो बुलंद,
वही ,अपनी मंजिल तक पहुँच ही जाते--।
लहरें उठती,लहरों से टकराती तो---
यह कहना चाहती है कि--
हवा के झोंके,ही मेरा वजूद है,
कश्तियाँ भी,डगमगाती हैं ,
मेरी लहरों का,ये भी दम भरते--।
========$$$$$$=========
व्याख्या:--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि लहरें को प्रतीक मानकर जीवन दर्शन की बात कही गई है ।
No comments:
Post a Comment