जिला- रायपुर छत्तीसगढ़
विधा- मुक्त छंद
शीर्षक- स्वरालिका सी सागर की लहरें
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कितना कुछ क्यों समेट लेती हैं,
कितना कुछ क्यों बहा ले जाती हैं
जिजीविषा की सतत परिधि में,
चट्टानों से फ़कत रोज टकराने में।
गूंजती है कुछ सन्नाटों को चीर,
लिखतीं है कुछ अनकही सी पीर।
सदियों से बनती रहीं मूक गवाह,
अब पुरोधा बन हुईं हैं सवाक।
स्वरालिका सुन लें अट्टालिका के
बहरे..........,
अवाम सी गरजती हैं सागर की
लहरें..........।।
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