जिला - बलौदाबाजार ( छ. ग. )
विषय - पुराने पन्नें
विधा - छंद मुक्त कविता
शीर्षक - पुरानी यादों के पन्नें
**********************************
// पुरानी यादों के पन्नें //
आज
करवा चौथ के दिन
आभूषणों से सजी - धजी
नई साड़ी में देखा
अपनी श्रीमती जी को
तो
उन्नीस साल पुरानी
यादों के पन्नें खुलते गए.....
शरमाती सकुचाती साँवली - सी लड़की
जिनके साथ सात फेरे लिए
अग्नि की साक्षी में
एवं जिनकी मांग में सिंदूर भरा ,
जो घर की बहू व मेरी धर्मपत्नी बनी ,
आज कितनी समझदार व सयानी हो गई है ।
जो पहले बात - बात पर
चिढ़ जाती थी , शिकायत करती थी
या रूठ जाती थी ,
आज वही सबको मनाती है
और समझाती है कि
परिवार में कैसे रहना है ?
जो चाय भी ठीक से नहीं बना पाती पहले
आज वही खुशी - खुशी
एक से एक व्यंजन बनाकर
खिलाती है सबको ।
इतने पर भी सास - श्वसुर , बच्चे
एवं अपने पति का
ध्यान रखती है पूरा - पूरा
अर्थात्
उठाये फिरती है
घर की सारी जिम्मेदारी ।
मैं सोचने लगा यादों में खोया.....
परिस्थिति व समय के साथ
सामंजस्य बैठाना
एवं तदनुसार बदलाव लाना
अपने में ,
यही विशेषता है भारतीय नारी की ।
सच मे
त्याग , प्रेम , सेवा और समर्पण का
पर्याय होती है नारी ।
धन्य है भारत की संस्कृति औऱ परम्पराएँ
एवं धन्य हैं वे बड़भागी लोग
जो श्रद्धा - भक्ति से इन्हें मानते हैं
और जीवन में अपनाते हैं ।
ऐसे लोग सुख , शांति व दिव्यता के
धनी हो जाते हैं ।
---#---#---#---
No comments:
Post a Comment