Wednesday, November 18, 2020

महासमुंद से विनोद कुमार जोगी की रचना- भ्रष्टाचारी राजधानी

रचनाकार :- विनोद कुमार जोगी
जिला :- महासमुंद
विषय :- भ्रष्टाचार की राजधानी
विधा :- मनहरण घनाक्षरी
शीर्षक :- भ्रष्टाचारी राजधानी

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भ्रष्टाचारी राजधानी,
काम में हो आना कानी,
बिना कोई चाय - पानी,
काम नहीं बने है।
         ऑफिस के दस्तावेज,
         पड़े रहे वे निस्तेज,
         बिना कोई वजन के,
        आगे नहीं बढ़े है।
रीत यहीं चल रही,
परंपरा बढ़ रही,
देने वाले देते रहे,
कुछ नहीं कहे है।
         मोटी है पगार पर,
         घूस से भरे उदर,
         घूस के ही कमाई से,
         तिजोरी भी ठने है।
भ्रष्टाचारी राजधानी,
करें सब मनमानी,
पैसों का ही खेल से जी,
काम सारे बने हैं।

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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने भ्रष्टाचार के व्यापक जड़ का वर्णन करते हुए कहा है कि आज स्थिति यह बन गई है बिना घूस के कोई काम नहीं होता।

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