स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"कागज की कश्ती"
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मुझे याद है घर के बाहर
बरसाती पानी का बहाव
कागज की कश्ती और
साथियों का जमाव
हाथों में पकड़ते- झगड़ते
धमाचौकड़ी उछलते-कूदते
कश्ती दूर जा भीग जाती
फुर्ती से फिर बन भी जाती
खूब मस्ती और मजा
याद करके उन पलों को
मुरझाए चेहरे में भी
मुस्कान फिर खिल जाती
कागज के थे भले खिलौने
पर थे अनमोल खजाने
हजार खिलौने हजारों के
आज हंसाने में औने-पौने
दौर वो पुराने फिर आ जाते
कागज की कश्ती बना
बच्चे फिर पानी में बहाते
काश उन्हें हम हँसा पाते
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