जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-आदमी
विधा-कविता( मुक्त छंद)
आदमी अब आदमी नहीं रहा
चेहरे पर जाने कितने मुखौटे ।
आदर्शों का लिबास ओढ़ जीता,
आदर्शों का मुखौटा ओढ़ मरता
धन लोलुपता,भौतिकता की चाह,
धर्म की आड़ ले चलता गलत राह
इंसान को अब पहचाने भी कैसे गिरगिट की तरह रंग बदलता है
आदमी लोगों के काम आना छोड़
अपने मुंह मिट्ठू मिया बनता है ।
मीराआर्ची चौहान
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