सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-काव्य
विषय-आदमी
आदमी होना भी कहाँ आसान होता है
जिम्मेदारियों से दबा बस इंसान होता है
सुनता रहता है सदा सबकी झिकझिक
पर अपनी कब, कहाँ कह पाता है
विवाह के बंधन में बंध ,खिंचता रहता है
कोल्हू के बैल सरीखे जीवन रूपी गाड़ी
पत्नी ,बच्चों की जरूरतें पूरी करने में ही
लगा देता है अपनी पूंजी सारी की सारी
माँ और पत्नी सब की सुनता रहता है
पर गलत को गलत नही कह पाता है
आदमी होना भी कहाँ आसान होता है
जिम्मेदारियों से दबा बस इंसान होता है
रोज निकलता है घर से कफ़न बांधे सर पर
ताकि सबकी जरूरते पुरी हों ,ना भूखा हो कोई
दिन भर ऑफिस में बॉस की डांट सुनता है
पर चेहरे पे मुस्कान लिए शाम बच्चों संग खेलता है
राशन -सब्जी,दूध-दवाई में कभी कमी नहीं करता
माँ-बाप के चरणों मे बैठ उनकी कुशल क्षेम भी पूछता
जीवन भर ईएमआई के बोझ से दबा रहता है
अपने शौक भूल , किस्तों में जीवन पूरी करता है
पर हर बुरी बात पे जिम्मेदार ठहराया जाता है
उंगली उठा उसी को कसूरवार ठहराया जाता है
आदमी होना भी कहाँ आसान होता है
जिम्मेदारियों से बंधा बस इंसान होता है।
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