निवास-बैरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
विधा-मुक्त छ्न्द ,कविता ।
शीर्षक-" ज्ञान " ।
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☆●•ज्ञान •●☆
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जगत में शिक्षा व ज्ञान ---
एक दूसरे के परिपूरक हैं ।
ज्ञान का दीप जलाकर---
जग के अँधियारे को मिटायें ।
ज्ञान सर्वत्र उपलब्ध होता है--
जिसको ,जिसकी जरूरत होती है,
वह उसे ,हासिल कर ही लेता ।
निरक्षर व्यक्ति भी--
होता है,ज्ञानशील,अपनी विधा में,
होता माहिर और बन जाता,हुनरबाज।
ज्ञान की पहली पाठशाला---
घर-परिवार व आसपास का ,
होता है,परिवेश ।
पाषाणकाल से आज तक--
मानव आवश्यकता ने,
अपने खोजी प्रवृति के कारण,
ज्ञान का प्रकाश फैलाते रहें हैं ।
गुरु बिन,ज्ञान अधूरा--
मिल जाय,जिसको सच्चा गुरु,
जीवन लक्ष्य वो,भेध है पाता,
मंजिल पा,गुरू का धन्यवाद करता ।
आओ मिलकर,ज्ञान का दीप जलायें,
ज्ञान के अँधियारे में भटके जनों को,
सही राह दिखाने की कोशिश में,
अपना एक कदम और आगे बढ़ायें ।
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व्याख्या:-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मानव जाति के लिए ज्ञान की महती आवश्यकता है ।इसके बिना जीवन जीने में भारी कठिनाई होती है ।जीवनोपयोगी ज्ञान जहाँ से भी मिले ग्रहण करते रहना चाहिए ।
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