जिला,,,,,राजनांदगांव छ. ग.
विषय,,मुक्त
कविता,,,,, *परिणय बंधन*
जब दो अनजान अपरिचित, आत्माओं का मिलन होता है।
अग्नि को साक्षी मान, वेद मंत्रों का उच्चारण होता है ।
ले सात फेरे सात वचन, बंध जाते हैं परिणय बंधन में ।
दो आत्माओं के साथ-साथ, होता है मिलन दो परिवार का।
पति पत्नी मिलकर, कर्तव्य निभाते हैं घर संसार का।
दो आत्मा विश्वास की डोरी में बंध, बंध जाते हैं परिणय बंधन में ।
गृहस्ती की गाड़ी के दो पहिए बन, साथ मिलकर चलते हैं ।
दीया और बाती सम, एक दूजे के जीवन में प्रकाश भरते हैं।
नोकझोंक के बीच खुशियाँ लिए, जीवन जीते हैं परिणय बंधन में।
पद्मा साहू *पर्वणी*
खैरागढ़ राजनांदगांव
No comments:
Post a Comment