Wednesday, November 4, 2020

रायगढ़ से पुष्पा पटनायक कृत संस्मरण- पुराने पन्ने

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- संस्मरण
शीर्षक -"पुराने -पन्ने"   
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                 दिपावली की साफ सफाई चल रही थी तभी मैंने कबाढ़ वाले कमरे की सफाई भी करने की ठानी जिसमें एक पुरानी टिन की पेटी रखी हुई थी । जिसका ताला पूरी तरह से जंग लगा हुआ था ।जहां तक मुझे याद है मम्मी के 2013 में स्वर्गवास के बाद वह बक्सा शायद ही  खुला हो या खोला भी गया हो तो पापा के द्वारा एक या दो बार खोला गया रहा होगा । अब तो पापा भी नहीं रहे और चाबी का भी अता-पता नहीं था । इसलिए मैंने पोताई कर रहे लड़कों में से एक को बुलाकर ताला तुड़वा दिया और बक्शे के समान को देखने लगी ।बक्से में कुछ पुराने कपड़े, एक पुरानी टॉर्च ,पुराना टेप  रिकॉर्डर और कुछ पुराने रंगीन पेपर थे, जो देश बंधु पेपर के  बुधवार और रविवारीय विशेषांक के पेज थे ,जिसमें रसोई के व्यंजन और घरेलू टिप्स थे ।इसी के साथ में एक पुरानी डायरी मिली जिसे मैं सफाई के बाद इत्मिनान से पढ़ी।पुरानी डायरी के पुराने पन्नों को पढ़कर पुरानी यादें ताजा हो गई थीं ।मां-बेटी के रिश्ते में कुछ छिपा नहीं था , पर डायरी से मुझे मां के अनछुए पहलुओं के बारे में काफी कुछ पता चला ।लेखन के प्रति रुचि देखने को मिली और साथ ही साथ उनकी अपने बच्चों को लेकर सोच और भाव की गहराइयों को जानकर मेरी आंखें भर आई। मैं उनकी लिखी एक बात  आपसे साझा कर रही हूँ,जो शायद मेरे पैदा होने के बाद लिखी होंगी:-
मेरे बेटे के जाने का सब दुख चला गया। आज भगवान ने मेरे बेटे के बदले में मुझे प्यारी बेटी देकर हिसाब किताब बराबर कर लिया है।मैं इसे खूब पढ़ाऊंगी,लिखाउंगी और एक अच्छा इंसान बनाउंगी ।जो- जो मैं न कर सकी वो सब ये करेगी चाहे कुछ भी करना पड़े ,किसी से भी लड़ना पड़े।  
                                               धन्यवाद प्रभु
सचमुच उनकी इस पुराने पन्नो ने मुझे जो दिया मैं बयाँ नही कर सकती ।ये पुराने पन्ने भले फटने के कगार पर हैं पर इसके हर शब्द मेरी अंतरआत्मा में कुछ इस तरह छाप छोड़ गए जो नए शरीर धारण करने पर भी शायद ही मीट सकें।
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टीप:-यह घटना परसो याने 2 नवम्बर की है।सिर्फ 2 दिन पुरानी ।मेरे घर में अभी पुताई का काम चल रहा है।

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