स्थान-नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला-जांजगीर -चाम्पा/ छत्तीसगढ
विधा-स्वेच्छित
विषय-कागज की कश्ती
शीर्षक-कागज की कश्ती
कागज की कश्ती मुझको, स्वीकार नहीं है ।
इसके सहारे कभी भी, किनार नहीं है ।
इसके सहारे कोई न मैं ,स्वप्न देखूंगा ।
जल में नहीं थल में,इसको मैं रखूंगा ।
जीवन में इसका कोई भी, दरकार नहीं है ।
जहां इसे रखोगे, वही डूब जायेगा ।
जीवन के सारे सपने, जो है रुक जायेगा ।
लकड़ी जैसे इसका कहीं, व्यवहार नहीं है ।
कागज की कश्ती तो, बच्चों के आते काम ।
इसे पाकर खुश हो,सभी खेलते तमाम ।
दे दो ना उनको लेने से, इनकार नहीं है ।
कागज की कश्ती को, करुं मैं भी सलाम।
नन्हें मुन्ने बच्चों का, आता है यह काम ।
मनोरंजन से मुझे भी, तकरार नहीं है ।
No comments:
Post a Comment