स्थान - दुर्ग (छ.ग.)
विधा - मुक्त
विषय- आदमी
शीर्षक -
*खोजती हूं इंसान*
ये दुनिया इंसानों की बस्ती,
ज्ञानी,परोपकारी,संवेदनशील
यही पहचान हर आदमी की,
खोजती हूं आज कोई तो हो,
जो इंसानियत को कर दे परिभाषित ।
दहशत क्यों हर राह फैली है?
क्या यह भय हैवानों से है ?
या आदमखोर जानवरों से ?
ये जंग किनके बीच छिड़ी है?
घूर रहे हर गली में दरिंदे यहांँ
नन्ही बच्ची भी महफूज कहाँ
इंसानों के भेष मे घूमते दरिंदे
सहमें हुए है छोटे-छोटे परिंदे ।
हर जीव परेशान, है हैरान
और..
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