Tuesday, November 17, 2020

दुर्ग से अनुरमा शुक्ला की रचना- खोजती हूं इंसान

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान - दुर्ग (छ.ग.)
विधा - मुक्त
विषय- आदमी
शीर्षक - 
     *खोजती हूं इंसान*
             
ये दुनिया इंसानों की बस्ती,
ज्ञानी,परोपकारी,संवेदनशील
यही पहचान हर आदमी की,
खोजती हूं आज कोई तो हो,
जो इंसानियत को कर दे  परिभाषित ।

दहशत क्यों हर राह फैली है?
क्या यह भय हैवानों से है ?
या आदमखोर जानवरों से ?
ये जंग किनके बीच छिड़ी है?

घूर रहे हर गली में दरिंदे यहांँ
नन्ही बच्ची भी महफूज कहाँ
इंसानों के भेष मे घूमते दरिंदे
सहमें हुए है छोटे-छोटे परिंदे ।

हर जीव परेशान, है हैरान
और..
मैं खोजती हूं इनमें इंसान...

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