स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- ग़ज़ल
शीर्षक -"वफ़ा-ए-ज़िन्दगी"
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जिसके आंखों में, शर्म और दिल में ख़ुद्दारी नहीं
आजकल जीने में उसको, कोई दुश्वारी नहीं ।
मुल्क के हालात, बिगड़ते जा रहें हैं दिन-ब-दिन
और आवाम कह रही है कोविड-19 बीमारी नहीं ।
आग सीने में भरी हो, यह तो अच्छी बात है
कूद जाना आग में , कोई समझदारी तो नहीं ।
हमने ऐसे सूरमा तो ,आज तलक नहीं देखे हैं
जंग लड़ने चल दिए ,और कोई तैयारी नहीं ।
खुद से लड़ते रहे ,फिर भी आज तक जिंदा हैं
जाने कितना हौसला है ,जिंदगी कभी हारी नहीं ।
चेहरे में चमक भी है, दरिया दिल भी है
उसमें सारी खूबियां हैं, पर वफ़ादारी नहीं ।
इसलिए 'पुष्पा ' शामिल, हो नहीं पाई भीड़ में
उसमें फनकारी तो है , लेकिन अदाकारी नहीं ।
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