Sunday, November 1, 2020

सारंगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- तुलसी बरत के महिमा

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले',
स्थान--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग } ,
विधा--कविता ,
शीर्षक---तुलसी बरत के महिमा
                     ०×××××०
कातिक महीना उठ  बिहाने , संगी    मोर   नहाले ।
तुलसी  माँ  के  करके  पूजा , दाई  धरम   कमाले ।।

सुत-उठ के तैं बड़े बिहनिया , तरिया - नरवा जाबे ,
नहाखोर   के   अर्पन  करबे , उगती मुहूँ  हो जाबे ।
ओंजरा - ओंजरा  भर  पानी , सूरुज ल  तैं चढ़ाले ।।
तुलसी  माँ  के  करके  पूजा , दाई  धरम   कमाले ।।१

तुलसी जरी  म  तेखर  पाछू , पानी   रोज  चढ़ाबे ,
ओखर  जरी  तरी  के  माटी , माथे तिलक लगाबे ।
बिस्नु भगवान के  पूजा दाई , करके  पुन्य कमाले ।।
तुलसी  माँ  के  करके  पूजा , दाई  धरम   कमाले ।।२

कच्चा ओंढा म  घर म आके , तुलसी म ढार पानी ,
सँझोती  दिया  आरती  बता , माता  तुलसी  रानी ।
हबिस्य   भोजन   एके  बेरा , अरपन करके खाले ।।
तुलसी  माँ  के  करके  पूजा , दाई  धरम   कमाले ।।३

उरीद  दरमी   छोड़  कोंहड़ा , रहिबे     शाकाहारी ,
सादा   ओंढा   पहिर   करबे , कातिक पूजा भारी ।
कातिक बरत के सुनबे कथा , मन म लेके  बसाले ।।
तुलसी  माँ  के  करके  पूजा , दाई  धरम   कमाले ।।४

बारे म  हे  अकास  दिया के , सबो पाप कट जाथे ,
दीपदान  पानी   म  करे   ले , बहुते च धरम  पाथे ।
कृष्ण-गोबिंद भजन ल गाके , बैकुठधाम      पाले ।।
तुलसी  माँ  के  करके  पूजा , दाई  धरम   कमाले ।।५

बरत बड़े कातिक महिमा के , अँवरा तरी  म जाबे ,
ओखर तरी म  राँधव  खाना , खुसी-खुसी तैं खाबे ।
कहिथे 'ठाकुर' ऐसन  करके , नैया    पार   लगाले ।।
तुलसी  माँ  के  करके  पूजा , दाई  धरम   कमाले ।।६
                       ०××××××०
व्याख्या--कार्तिक महीना एवं कार्तिकमहात्म्य का
              यथा संभव वर्णन करने का प्रयास किया
               गया है ।

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