स्थान--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग } ,
विधा--कविता ,
शीर्षक---तुलसी बरत के महिमा
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कातिक महीना उठ बिहाने , संगी मोर नहाले ।
तुलसी माँ के करके पूजा , दाई धरम कमाले ।।
सुत-उठ के तैं बड़े बिहनिया , तरिया - नरवा जाबे ,
नहाखोर के अर्पन करबे , उगती मुहूँ हो जाबे ।
ओंजरा - ओंजरा भर पानी , सूरुज ल तैं चढ़ाले ।।
तुलसी माँ के करके पूजा , दाई धरम कमाले ।।१
तुलसी जरी म तेखर पाछू , पानी रोज चढ़ाबे ,
ओखर जरी तरी के माटी , माथे तिलक लगाबे ।
बिस्नु भगवान के पूजा दाई , करके पुन्य कमाले ।।
तुलसी माँ के करके पूजा , दाई धरम कमाले ।।२
कच्चा ओंढा म घर म आके , तुलसी म ढार पानी ,
सँझोती दिया आरती बता , माता तुलसी रानी ।
हबिस्य भोजन एके बेरा , अरपन करके खाले ।।
तुलसी माँ के करके पूजा , दाई धरम कमाले ।।३
उरीद दरमी छोड़ कोंहड़ा , रहिबे शाकाहारी ,
सादा ओंढा पहिर करबे , कातिक पूजा भारी ।
कातिक बरत के सुनबे कथा , मन म लेके बसाले ।।
तुलसी माँ के करके पूजा , दाई धरम कमाले ।।४
बारे म हे अकास दिया के , सबो पाप कट जाथे ,
दीपदान पानी म करे ले , बहुते च धरम पाथे ।
कृष्ण-गोबिंद भजन ल गाके , बैकुठधाम पाले ।।
तुलसी माँ के करके पूजा , दाई धरम कमाले ।।५
बरत बड़े कातिक महिमा के , अँवरा तरी म जाबे ,
ओखर तरी म राँधव खाना , खुसी-खुसी तैं खाबे ।
कहिथे 'ठाकुर' ऐसन करके , नैया पार लगाले ।।
तुलसी माँ के करके पूजा , दाई धरम कमाले ।।६
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व्याख्या--कार्तिक महीना एवं कार्तिकमहात्म्य का
यथा संभव वर्णन करने का प्रयास किया
गया है ।
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