स्थान-दुर्ग (छ.ग.)
विधा- छंद मुक्त
शीर्षक -
*लक्ष्य*
जन्म मिला मानुष का
यूं ही निरर्थक करना ना,
कुछ कर्म ऐसा कर जा,
जीवन सार्थक तू बना
लक्ष्य हो गर निर्धारित
मिलती जरुर मंज़िल
कर गरीबों का भला,
हो सदुपयोग काया का ।
जिंदगी के सफर में
मिलेगी कई चुनौंतियाँ
ठान ले कर्मपथ पर
चलना है निरंतर
देख अवरोधक रुकना ना
मन का धीरज खोना ना
बेसहारों का सहारा बन जा
निज स्वार्थ में ही जीना ना ।
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