जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय/शीर्षक _पतझड़
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जीवन में डालों सी लचक चाहिए,
खिलती कलियों सी महक चाहिए ।
जीवन का गुलदस्ता यूॅं ही नहीं महकता,
हर मुस्कुराहट को जरा कसक चाहिए ।।
सब्र में बसंत की बहार झूम कर आएगी,
धरती की चरण बादल चूम कर आएगी ।
दुखों को लबों में सजाए रखना,
खुशियों की गलियाॅं तुम तक घूमकर आएगी ।।
रेगिस्तान में नागफनियॉं भी खिला करती हैं,
छद्म मरीचिकाऐं वहाॅं सहज ही मिला करती हैं ।
लू के थपेड़ों को संभाले रखना,
इनसे भी तो पत्तियाॅं हिला करती हैं ।।
संभाले पुष्प अब बिखरने लगे हैं,
जड़ों संग तना सिहरने लगे हैं ।
किसकी दुआएं काम कर रही हैं,
पतझड़ में भी पत्तियाॅं निखरने लगी हैं ।।
खुशियों के पत्ते झरने लगे हैं,
तना-फल-फूल सब मरने लगे हैं ।
ये फल मुझसे ही टूटकर गिरा था,
बीज अंकुरित हो फिर सॅंवरने लगे हैं ।।
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स्वरचित मौलिक रचना
गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न
रायगढ़ छत्तीसगढ़
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