Monday, October 12, 2020

चेतन सिंह की रचना- तवायफ

रचनाकार - चेतन सिंह
पता ------- कसडोल, छत्तीसगढ़
शीर्षक----तवायफ
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सच   जिंदा है  आज   उन  कोठों  पर ,
जहाँ  सिर्फ   "जिस्में"  बेची  जाती  है !
वर्ना क्या -क्या नहीं बिकती कोठियों पर ,
जिसे  सोच   "हया " भी  शर्माती  है !

जिल्लत   से   कहते   हैं ,
लोग  जिन्हें   तवायफ ;
अपनी आबरू बेचकर ,
बहुतों का इज्जत बचाती है !

पर कैसे मुमकिन हुआ ,
उनका इस दर पे आना ;
कुछ को जरूरतें ,तो कुछ को
तकदीर खींच लाती है !

ये   जिस्मफरोशी  का  धंधा ,
मिलती नहीं किसी को विरासत में ;
अपने ही कई सौदागर यहाँ ,तो
कुछ सिक्कों में बिक जाती है !

इज्जत   तार -  तार   हुई ,
शर्म -लाज भी छीन लिया उनसे ;
वर्ना   कौन है  जो सीने से ,
स्वयं अपना दुपट्टा गिराती है !

क्या कहते हैं उन्हें ,
बता दो ऐ बेखबर दुनिया मुझे ;
कुछ सहमे , कुछ बहके कदम ,
उस चौखट तक जो आती है !

कोरे कागज सी थी ,
हयात     उनकी   भी ;
चंद रंगीन मिजाजों की शय में ,
जाने क्या - क्या रंग भर जाती है !

ये बेटियां ,    ये  नारियां  ,
है अपने  ही   फिजां  की ;
चाहे तेरा , चाहे मेरा , हमारे ही 
खूँ की महक उनसे आती है !

किसी   शहर  में यूँ  ही ,
नहीं होती वो बदनाम गलियां ;
इस सभ्य समाज में वो ,
चंद पुरूषों की औकात दिखाती है !

बेशक , तलबगार नहीं मैं ,
उन    तंग   गलियों   का ;
रो - रोकर दर्द उनका ,
मेरी कलम मुझको बताती है !

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