पता ------- कसडोल, छत्तीसगढ़
शीर्षक----तवायफ
------------------------------------------
सच जिंदा है आज उन कोठों पर ,
जहाँ सिर्फ "जिस्में" बेची जाती है !
वर्ना क्या -क्या नहीं बिकती कोठियों पर ,
जिसे सोच "हया " भी शर्माती है !
जिल्लत से कहते हैं ,
लोग जिन्हें तवायफ ;
अपनी आबरू बेचकर ,
बहुतों का इज्जत बचाती है !
पर कैसे मुमकिन हुआ ,
उनका इस दर पे आना ;
कुछ को जरूरतें ,तो कुछ को
तकदीर खींच लाती है !
ये जिस्मफरोशी का धंधा ,
मिलती नहीं किसी को विरासत में ;
अपने ही कई सौदागर यहाँ ,तो
कुछ सिक्कों में बिक जाती है !
इज्जत तार - तार हुई ,
शर्म -लाज भी छीन लिया उनसे ;
वर्ना कौन है जो सीने से ,
स्वयं अपना दुपट्टा गिराती है !
क्या कहते हैं उन्हें ,
बता दो ऐ बेखबर दुनिया मुझे ;
कुछ सहमे , कुछ बहके कदम ,
उस चौखट तक जो आती है !
कोरे कागज सी थी ,
हयात उनकी भी ;
चंद रंगीन मिजाजों की शय में ,
जाने क्या - क्या रंग भर जाती है !
ये बेटियां , ये नारियां ,
है अपने ही फिजां की ;
चाहे तेरा , चाहे मेरा , हमारे ही
खूँ की महक उनसे आती है !
किसी शहर में यूँ ही ,
नहीं होती वो बदनाम गलियां ;
इस सभ्य समाज में वो ,
चंद पुरूषों की औकात दिखाती है !
बेशक , तलबगार नहीं मैं ,
उन तंग गलियों का ;
रो - रोकर दर्द उनका ,
मेरी कलम मुझको बताती है !
No comments:
Post a Comment